Friday, 9 August 2013

दिमाग से पैदल कुछ तीतर.....

बैठे हैं कुछ ‘दिमाग-से-पैदल’ ‘भावुक-मूर्ख’ आज भी तंग दर्रों में...
बर्फ़ पे....रेगिस्तान की लू में....जंगलों में....
बैठे संगीनों के साए में
गलाते हुए हड्डियाँ...और ताने अपना सीना...
पता नहीं पागलों को....
आगे तो है ही दुश्मन....
पर अब पीछे भी घात लगाये है दुश्मन...

दिमाग से पैदल
अकेले बैठे हुए बचपन के वो दिन आज याद आ गए...जब २६ जनवरी को ध्वजारोहण के समय राष्ट्र-भक्ति के गीत और राष्ट्रगान सुनते हुए... नसें फड़फड़ाने लगती थीं और शरीर पर रौएँ उठ आते थे....उस समय ये समझ में नहीं आता था कि वे सारे बोल और ध्वनियाँ जिस तरह से मेरे ‘endoplasmic reticulum’ को चीर कर शरीर की हर कोशिका के ‘nucleolus’ तक मार करतीं थीं...क्या वैसा सबके साथ होता है...या एक मैं ही ऐसा घनचक्कर हूँ जिसका मस्तिष्क और शरीर इतना कमज़ोर है कि चन्द बोलों और सुरों के कान पर पड़ने मात्र से ही मैं पागल हुआ जा रहा हूँ....ये बात बाक़ी सहपाठियों से करने या पूछने में डर और शर्म दोनों ही आती थी क्योंकि उस उम्र की डर और शर्म दोनों ही काफ़ी लम्बा असर डालती हैं मनुष्य के दिमाग़ पे... लिहाजा दिमाग स्वतः इस तरह के ‘दुस्साहस’ के लिए पहले ही चेता देता है!!

खैर... बड़े होने लगे और हर तरह के अनुभवों से दुनिया में जीने की सीख मिल ही रही थी कि...तभी हमारी पीढ़ी के साथ हो हादसे हुए. १. भारत की अर्थव्यवस्था का उदारीकरण और २. उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना....ये दोनों ऐतिहासिक तौर पे हास्यास्पद काम क्या हुए...पूरे देश में....नेता...राजनैतिक पार्टी....बिचौलिए...नौसिखिए नौकरशाह...पिछलग्गुओं की एक ऐसी ज़मात पैदा हुई...जो आनन-फानन में इनता काम देख के कतई बावले हुए जा रहे थे...इसी दौरान...पहली बार आदरणीय हर्षद मेहता जी का नाम सुना और फिर परम आदरणीय लालू जी का नाम सुनने में आया....अब अखबार पटे जा रहे थे खबरों से तो लगा - यार UPSC की किसी ‘प्रतियोगी-परीक्षा’ में आ ही न जाये कुछ सवाल...कि फलां-फलां विभाग में कौनसा घोटाला पकड़ा गया...कौन से साल में पकड़ा गया...उन महानुभावों के नाम बताईये....या इस बारे में आपके ख्याल और विश्लेषण ‘अधिक से अधिक’ 500 शब्दों में प्रकट करें...तो बेटा क्या लिखोगे....साले लिखित परीक्षा से ही पार नहीं पा सकोगे तुम तो...इंटरव्यू क्या खाक दोगे!! अब साहब...एक दो हों तो इन्सान दिल लगा के याद भी रखे...वैसे ही नाकाम इतिहास कम छोड़ कर गए हैं हमारे ‘चौधरी’, कि ये भी याद रखें...और अब अगर ‘सूनामी’ ही आ जाये तो कहाँ से मिलेगा ऐसा तिलिस्मी च्यवनप्राश जो दिमाग़ी स्फूर्ति ‘चाचा चौधरी’ की तरह क़ायम रखे...तो बहरहाल इस ज्ञान को अपने हाल पर ही छोड़ दिया...और UPSC की हर परीक्षा के पुराने पेपर देख के आत्म-संतुष्टि हुई कि हाँ जी कम-से-कम वहां ‘ठीक-ठाक’ लोग बैठे हुये हैं....

कॉलेज से निकलने की तैयारी लगभग होने ही लगी थी कि ‘कारगिल’ हो गया...NCC में कैडेट तो थे ही... तो बार-बार दिमाग़ में ख्याल आने लगे कि यार कोई ऐसी स्कीम नहीं है कि सीधा बॉर्डर पर पहुंचा दिया जाए... टेंट लगाना...क्रौलिंग करना...ट्रेंच खोदना और फायर करना तो सीख ही लिया है...बाक़ी ट्रेनिंग में बस दुश्मन ही नहीं दिखता था....बॉर्डर पर तो वो भी मिल जायेगा और...’टारगेट-प्रैक्टिस’ की जगह अब ‘असल’ जगह गोली मारने का मन भी करने ही लगा था... धीरे-धीरे आजीविका के साधन ढूँढने के उपाय भी दिमाग में आने लगे...तो ‘दिमाग’ बोला - अबे जोकर फ़ौज है ना...तो दिल भी बोला - हाँ बे! फ़ौज है ना... तो भाई साहब जब लोगों से पूछा तो बोले वहां तो ‘दिमाग से पैदल’ ‘उल्लू-के-पठ्ठे’ ही चाहिए...जो जाता है सेलेक्ट हो जाता है....फ़िक्र मत कर तेरे जैसे ‘अकल-से-पैदल’ बहुत कम हैं इस देश में....तेरा नं. आ ही जायेगा!

तो भाई साहब तैयारी कर-करा के दे दी UPSC की लिखित परीक्षा...’Employment News’ में रिजल्ट देखा तो अपना नाम देख के अपने ‘पैदल’ दिमाग़ पे थोड़ा सा कॉन्फिडेंस बना कि ठीक-ठाक ही है शायद...जो पास हो गए... अब बारी थी उस कष्टदायी...SSB Interview की जिस के बारे में सुना था कि कई दिग्गज भी पानी पी के वापस आ गए थे....अमिताभ बच्चन....आपके किंग खान...पता नहीं कौन-कौन... डर के मारे NCC के instructors के पास गए कुछ ज्ञान लेने के लिए...वो बोले...अबे मस्त हो के जा....अगर ‘थोड़ा सा’ भी दिमाग है तो उसे सही से इस्तेमाल करना... घोर असमंजस की स्थिति थी...एक तरफ लोग बोलें ‘दिमाग से पैदल’ लोग चाहिए और ये बोल रहे हैं...कि दिमाग सही से इस्तेमाल करना...कई रातें नींद नहीं आये...अंततः एक किताब ख़रीदी....चेक किया कि वहां होता क्या है....कुछ मित्रों से मिले...और चल दिए...बजरंग बली का नाम लेकर...

वहां पहुँच के हतप्रभ था की मेरे उन सलाहकारों को शायद यह ज्ञान नहीं कि इस देश में कितने ‘भावुक-मूर्ख’ मेरी ही जैसी बीमारी से ग्रसित हैं....कितने ‘दिमाग से पैदल’ हैं इस देश में जो ट्रेन भर-भर के पहुँचते हैं वहां...सिर्फ इस आस पे कि काम तो कोई सा भी कर लेंगे...लेकिन ये मिला तो जीवन सफल होगा....उल्लू के पठ्ठे हंसते-हंसते आते हैं और रोते हुए जाते हैं...दोबारा फिर आते हैं....तीसरी बार भी आते हैं...कई-कई बार आते हैं जब तक कि सेलेक्ट न हो जाएं...हार न मानने की कला कोई सही मायनों में इन जोकरों से सीखे!! खैर...पता चला कि इस ‘दिमाग़ी प्रयोशाला’ से हमने पार पा ही लिया है...

तो ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकैडमी, OTA चेन्नई में SSC-75 (मेरा कोर्स सीरियल नम्बर) में अपने जैसे ही कुछ और ‘दिमाग से पैदलों’ के ‘सरदारों’ के साथ हमने भी आला दर्ज़े का रगड़ा दबा के खाया... पूरी ट्रेनिंग के दौरान...कई ‘प्रसाद’ और ‘पण्डित’ ऐसे भी मिले कि सीना ऊँचा कर के ज़िन्दगी जीने के कीटाणु तंत्र में समाहित हो गए.... ट्रेनिंग पूरी हुई....एक अजीब सी ‘विस्मयकारी’ कसम खाई...और उस कसम के पालन के लिए...वे सब कार्य किये जो ‘भारत’ की अखंडता के लिए ज़रूरी थे....जहाँ भेजा गया वहां गए....वैसे भी काम है ही क्या...सुबह उठो पागलों की तरह दौड़ो.....दिन-दोपहरी में ट्रेनिंग करो....शाम को फिर खच्चरों की तरह फिर दौड़ो....और रात को फैल के मुफ़त की शराब पियो....फिर सुबह उठो पता चला कोई ‘खादी वाला VIP’ आने वाला है उसकी ‘सुरक्षा’ करनी है...लग जाओ काम पे...फिर ट्रेनिंग....कभी पहाड़...कभी दर्रे....कभी रेगिस्तान...कभी बर्फ़...कभी नदी... दुश्मन बता के थोड़ी आयेगा....कि यहाँ से आ रहा हूँ!! तो भाई ‘शांति-काल में पसीना बहाते हैं कि लड़ाई में खून न बहाना पड़े....इसलिए ट्रेनिंग आला दर्जे की..’ अब ऐसा काम और नौकरी तो कोई उल्लू का पठ्ठा ही कर सकता है यार.... वैसे भी ‘अकैडमी’ और ‘रेजिमेंटल सेण्टरों’ में पाए गए रगड़े और ट्रेनिंग की लगातार चेकिंग भी करनी ज़रूरी होती है कि हम ‘दुरुस्त’ हैं या नहीं. फिर ज़रुरत आने पे....दंगाईयों से....बाढ़ से....गढ्ढे में गिरने से...आतंकवादियों से...सूनामी से...भूकंप से....CWG (कॉमन वेल्थ गेम्स) के धूर्त ठेकेदारों से... इस देश की नाख को भी तो बचाना ही है...

सही मायनों में किसी भी सभ्य समाज में सेना की ज़रुरत ही क्यों पड़ती है...ये बात आज तक ‘पैदल दिमाग’ में घुस नहीं पाई... वैसे भी वैश्वीकरण के इस दौर में अब जब कुछ एक-दूसरे का है...तो ‘फ़ौज’ किसलिए भाई....नाहक इतना खर्चा....और ऊपर से घर-परिवार किस हाल में है यह बात दुश्मन की तरफ मुँह कर के...इस ख्याल पर छोड़ दिया...कि है ना हमारा एक अदद ‘सिस्टम’ और वो कृतज्ञ राष्ट्र जो कम-से-कम इतना हाथ तो शायद बटा ही देगा...अब दुश्मन को छोड़ के तो... जा नहीं सकते न भाई...कसम खाई...है..ऐसी की तैसी.....!!!

तो भाई..कई घटनाओं के बाद एक ‘भीम सिंह’ ने आखिरकार वह बात बोल ही डाली जो कई बार अपने यार-दोस्त मज़ाक में बोलते ही थे...की साले मरने के लिए ही तो गया है न तू.... अब दुश्मन की तरफ मुहं करे और सीना फुलाये उन योध्धाओं से कैसे बोलें कि यार डटा रह...! यहाँ सब ठीक है...! मैदान में तो जाहिर है कि सामने दुश्मन ही है या कोई और...सोचना नहीं पड़ता...पर अब पीठ पीछे....घर पर बैठे दुश्मन से कैसे पार जाया जाये. इन ‘भीम-सिंहों’....’नीतिश कुमारों’...और इन ‘एंटोनियों’ को कोई कैसे बताये...की किस भरोसे कुछ ‘दिमाग से पैदल’ चल देते हैं...सीमा की ओर... वैसे ‘भीम सिंह’ को अपने ‘साहस’ के लिए बधाई तो दूंगा ही, कि उन्होनें फ़ौज और एक ‘फ़ौजी’ के बारे में जनता (प्रतिनिधि होते हुए) और ‘सत्ता’ के ख़यालात की पुष्टि करने की हिम्मत उठाई है...

बहरहाल, देश के बाक़ी दिमाग़ी-धनाढ्यों को जल्द ही इस बात की विवेचना और पुष्टि कर इन जैसे कृतघ्नों और ’दिमाग से पैदलों’ की छंटनी ख़ुद करनी ही होगी....वरना....CBI...IB...और RAW की तरह देश के एक और आला दर्जे के संस्थान पर इन ‘ढक्कनों’ की निम्न सोच के चलते देर-सवेर दीमक लग ही जायेगा.....

इस सन्दर्भ में बचपन की उस तीतर वाली पहेली की याद आती है जो पिताजी कई बार पूछते थे.....

’आगे दुश्मन...पीछे दुश्मन...दुश्मन के आगे दुश्मन...दुश्मन के पीछे दुश्मन...बोलो कितने दुश्मन....’

जय हो.....(हो गया भारत निर्माण).....

3 comments:

  1. शानदार मेजर,मारक है पर भावनात्मक ज्यादा है.सैनिकों की भावुकता पर ही तो अब कहा जा रहा है कि- मरने के लिए ही नौकरी करते है ...

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  2. We will one day find the remedy for this cancer or one day this malignant tumor will be destroyed by its own poison's weight.

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  3. bhai...acha likha to hai tu...but thoda aur time dega to aur badhiya hoga...keep posting

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